1अप्रैल से मध्यप्रदेश एमएसएमई विकास नीति एवं प्रोत्साहन योजना होगी लागू

धार @ प्रदेश के समग्र औद्योगिक विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पिछले वर्ष हुए एमएसएमई सम्मेलन में म.प्र.एमएसएमई विकास नीति 2017 जारी की गई थी। यह विकास नीति प्रदेश में एक अप्रैल, 2018 से लागू की जा रही है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्यमंत्री (स्वत्रंत प्रभार) संजय-सत्येन्द्र पाठक ने नए वित्तीय वर्ष की प्राथमिकताओं का उल्लेख करते हुए यह जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए विभाग का 852 करोड़ 42 लाख 65 हजार रुपये का बजट मंजूर हुआ है।

राज्य मंत्री पाठक ने बताया कि विकास नीति 2017 के साथ-साथ मध्यप्रदेश एमएसएमई प्रोत्साहन योजना 2017 भी इसी तारीख से लागू होगी। प्रोत्साहन योजना में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों की नीति के अंतर्गत सहायता,सुविधा उपलब्ध करवाई जायेगी।

विकास नीति 2017 में मिलेंगी सहूलियतें – विभिन्न अनुदान का एकीकरण कर एमएसएमई को निवेश का 40 प्रतिशत उद्योग विकास अनुदान के रूप में 5 वार्षिक किश्तों में दिया जायेगा। यदि निवेशक मध्यम श्रेणी के विनिर्माण उद्यम की स्थापना के उद्देश्य से निजी भूमि खरीदता है अथवा अविकसित शासकीय भूमि शासन से प्राप्त करता है, तो ऐसी इकाईयों को इकाई परिसर तक पानी, सड़क और बिजली व्यवस्था के लिये अधोसरंचना विकास में किये गये व्यय की 50 फीसदी वित्तीय सहायता, अधिकतम 25 लाख रूपये मिलेंगे।

औद्योगिक इकाइयों को अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों, जिनमें ईटीपी, एसटीपी आदि शामिल हैं, की स्थापना में निवेश के लिए 50 प्रतिशत पूँजी अनुदान अधिकतम 25 लाख रूपये मिलेंगे।निजी औद्योगिक क्षेत्रों तथा बहुमंजिला औद्योगिक परिसर की स्थापना,विकास के लिए व्यय की गई राशि का 20 प्रतिशत अधिकतम 2 करोड़ रूपये की सहायता प्रदान की जाएगी। विकसित औद्योगिक क्षेत्र का क्षेत्रफल न्यूनतम 5 एकड़ या बहुमंजिला औद्योगिक परिसर का कारपेट क्षेत्र कम से कम 10 हजार वर्ग फीट होना जरूरी है। इनमें 5 औद्योगिक इकाईयाँ कार्यरत होना जरूरी होगा।

नई औद्योगिक इकाईयाँ, जिनमें 10 से अधिक नियमित कर्मचारियों के सीपीएफ में प्रति कर्मचारी अधिकतम 1 हजार रूपये नियोक्ता के अंश के रूप में जमा किए जा रहे हों, ऐसे कर्मचारियों को नियोक्ता के अंश की शत-प्रतिशत राशि की प्रतिपूर्ति 5 वर्ष की अवधि के लिए या अधिकतम 5 लाख रूपये(इनमें से जो भी कम हो) प्रदान की जाएगी। गुणवत्ता प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए व्यय का 50 प्रतिशत अधिकतम 3 लाख रूपये की प्रतिपूर्ति विभाग द्वारा की जाएगी।