सरसों का तेल हमारे खाने के लिए अच्छा है या नहीं, किन कारणों से इसका तेल हानिकारक है?

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आज से 3० साल पहले तक कोई रिफाइंड या अन्य तेल को जानता नहीं था, सरसो बोते थे सभी खेतो में और उसी के तेल से सारा खाना पानी होता था , सब बुढ़ापे तक जीवित रहे और सेहतमंद थे आज की जागरूक पीढ़ी के मुकाबले। अब इस चमत्कार का राज़ मुझे भी नहीं पता । आयुर्वेद में सरसों के तेल का खाने में प्रयोग पर निषेध है-

हाँ यह बात कुछ हद तक सही है – आयुर्वेद में निषेध का तो मुझे ज्ञान नहीं लेकिन लिखा है कि सरसों का तेल उष्ण प्रवत्ति या गर्म तासीर का है, और रक्तपित्त को उभाड़ता है. (देखें चरक संहिता – सूत्रस्थान:२७:२९० और अष्टांगहृदयं – सूत्रस्थान:५:५९).

आयुर्वेद के अनुसार सरसों का तेल मालिश के लिए अच्छा है लेकिन इसका प्रयोग खाने के लिए कम करना चाहिए. आधुनिक विज्ञान के अनुसार सरसों का तेल नुकसानदेह क्यों है और पश्चिमी देशों में इस पर क्यूँ प्रतिबंध है?

सरसों का तेल पश्चिमी देशों में प्रतिबंधित है. कुछ समय पहले मैं भारतीय स्टोर से सरसों का तेल लाई थी . इसकी फोटो लगा रही हूँ. आप देख सकते हैं कि भारत से एक्सपोर्ट हुए डाबर के तेल की शीशी पर साफ़ लिखा है – “for external use only”

बहुत पहले, ७० के दशक में, जानवरों पर तेलों के असर के कई शोध हुए. सबसे अहम शोध पत्र में तोरिया (rapeseed) के तेल का चूहों पर असर का अध्ययन किया गया[1]. इस शोध का निष्कर्ष निकला कि तोरिया के तेल में मौजूद Erucic Acid का हृदय की गतिविधि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. तोरिया के तेल में 20% से 50% तक Erucic Acid हो सकता है. सरसों के तेल में 40% से भी अधिक Erucic acid होता है. तो तोरिया के तेल पर हुए शोध के फलस्वरूप तोरिया के तेल और सरसों के तेल दोनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

ध्यान देने की बात है कि (1) ये शोध तकरीबन 40 साल पुराने हैं, (2) सिर्फ जानवरों पर ही हुए, और (3) सरसों के तेल पर नहीं हुए.

तो सरसों के तेल पर पश्चिमी देशों में लगे प्रतिबंध का कारण स्पष्ट है और वो ये है कि सरसों के तेल में काफी मात्रा में Erucic Acid पाया जाता है. मुझे किसी भी आधुनिक शोध पत्र – जिसमे क्लिनिकल शोध हो – की जानकारी नहीं है जिसमे निश्चित रूप से ये प्रमाणित किया गया हो कि सरसों का तेल मनुष्यों के लिए खराब है (कुछ सर्वेक्षण हैं, लेकिन मैं उन्हें तरजीह नहीं देती).

सरसों का तेल हमारे खाने के लिए अच्छा है या नहीं

ये वैज्ञानिक रूप से नहीं कहा जा सकता. आयुर्वेद में प्रतिकूल टिप्पणी है लेकिन मैंने निषेध शब्द तो सरसों के तेल के लिए नहीं देखा। तो इसका इस्तेमाल अगर आप अपने खाने में नहीं करते हैं, तो कोई बात ही नहीं, अगर थोड़ा बहुत करते हैं तो परेशान न हों और बहुतायत में करते हैं तो थोड़ा कम करें।

कुमार मुकुल बताते है की आयुर्वेद में सरसों तेल का निषेध है ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। मेरे लिहाज से सरसों को तेल बाकी तेलों से बेहतर है। मेरे पिता सरसों तेल का जीवन भर व्‍यवहार करते रहे। वे अस्‍सी साल की अवधि तक जिए और उन्‍हें सरसों से कभी कोई समस्‍या नहीं हुई। उन्‍हें युवा काल में साइनस हुआ था तब उसके इलाज के बाद किसी की सलाह से वे नहाने के पहले नियमित सरसों तेल नाक ठेहुने व नाभि में लगाते थे व शरीर में भी लगाते थे। उनका साइनस उसके बाद जीवन भर नियंत्रित रहा।

पिछले दशक में सरसों को ड्राप्‍सी बीमारी से जोड कर गलत प्रचारित किया गया ताकि रिफायंड तेल का बाजार बने। इसमें वे सफल भी रहे पर अब रिफायंड की गडबडी पर चर्चा हो रही। इसी तरह नारियल तेल के बारे में कुछ गलत बातें फैलायाी जा रही हैं। लोगों को अपने अध्‍ययन व अनुभवों के आलोक में इन चीजों के सेवन पर विचार करना चाहिए। एक के लिए जो अच्‍छा है वह दूसरे के लिए तात्‍कालिक या लंबे समय तक के लिए हानिकारक भी हो सकता है।

सदियों से हम भारतीय सरसो के तेल का सेवन करते आ रहे हैं और आज भी 99% उत्तर भारत मे सरसो के तेल का ही सेवन होता है यदि ऐसा कुछ होता तो कबका लोग इसकी खेती करना छोड़ चुके होते। खैर रही बात आयुर्वेद की तो ऐसा कोई उल्लेख मुझे नही मिला। पर एक प्रोफेशनल की तरह नही एक आम व्यक्ति की तरह जवाब देना चाहूंगा।

वो यह कि उत्तर भारत मे सरसो, दक्षिण भारत मे नारियल पूर्वी भारत मे महुआ सरसो के साथ साथ सेवन किया जाता है। अर्थात यह भी कहा जा सकता है कि जहां जो पदार्थ आसानी से मिले या कम खर्च मे मिले या उसकी उपज उस क्षेत्र मे आसान हो वही वस्तु वहां की जनता की रोज़मर्रा की जिंदगी मे शामिल हो जाती है। और आयुर्वेद के अनुसार वही वस्तु उचित भी बताई गई है।

देश, काल और मौसम भी हमारी जिंदगी मे बहुत मायने रखते हैं। कनेडा, यूरोप और अमेरिका मे इसकी खेती ही मुश्किल होती होगी। वैसे भी विदेशी भारतीय वस्तुओं का स्तेमाल कम ही करते हैं।