असम से घुसपैठियों को भगाने के लिए बनाये गये राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर चालीस लाख के पक्ष में लामबंद हमलावर विपक्ष पर विशेष

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✍ भोलानाथ मिश्र

किसी भी देश में जब किसी दूसरे देश के नागरिक अधिकृत अथवा अनधिकृत रूप से आकर बस जाते हैं तो उनके देश के लोगों के आने के वह माध्यम बन जाते हैं।शायद यही कारण है कि रोंहिग्या मुस्लिम समुदाय के लोग सालों से इधर उधर शरण के लिये भटक रहे हैं लेकिन कोई देश लेने को तैयार नहीं है।

सभी जानते हैं कि बांग्लादेश घुसपैठियों की समस्या से हमारा देश पिछले करीब चार दशकों से पीड़ित है और विदेशी देश विरोधी ताकतों को पनाह देने का मुख्य माध्यम बने हुए हैं।घुसपैठ की समस्या से असम पश्चिम बंगाल और जम्मू कश्मीर शामिल है। इन तीनों राज्यों में घुसपैठ के चलते दुश्मनों को अपनी देश विरोधी गतिविधियों को संचालित करने का मौका मिल रहा है।

असम एवं बंगाल में बांगलादेशी घुसपैठ के कारण ही राज्य के मूल निवासियों का असित्व खतरे में पड़ गया है और साम्प्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा है।यहीं कारण है कि असम में पहली बार राष्ट्रहित में सुप्रीम कोर्ट को इस समस्या के निदान के लिए हस्तक्षेप करके वहाँ पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर अपनी निगरानी में तैयार करने के निर्देश सरकार को देना पड़ा।

इस अभियान के तहत असम के सवा तीन करोड़ से ज्यादा लोगों ने इस राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन किया था। इनमें से पौने तीन करोड़ लोग ही अपनी नागरिकता को प्रमाणित कर सके हैं।चालीस लाख लोग ऐसे मिले हैं जो अपनी नागरिकता को साबित नहीं कर पाये हैं।

असम में नागरिकता का पहला ड्राफ्ट इसी साल जनवरी में जारी किया गया था और उस समय केवल एक करोड़ नौ लाख लोगों को भारत का वैध नागरिक माना गया था।दूसरा ड्राफ्ट परसों सोमवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में जारी किया गया है जिसमें असम के चालीस लाख लोगों के नाम शामिल नही हैं।

इस ड्राफ्ट के जारी होते ही हाहाकार मच गया है और लोग इसे देखकर दंग रह गये हैं। इसमें मुस्लिमों के साथ ही हिंदुओं के नाम शामिल होने से छूट गये हैं।हालांकि सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने अगले महीने का समय दिया है कि जिनके नाम छूट गये हैं वह अपनी नागरिकता का प्रमाण दिखाकर अपना छूटा नाम शामिल करवा सकते हैं।

इसके बावजूद राजनैतिक तूफान साआ गया है और संसद से लेकर सड़कों तक इसका विरोध शुरू हो गया है। चालीस लाख लोगों के नाम छूटना असम जैसे राज्य के लिए बड़ी बात नहीं है लेकिन अभियान के नाम पर सभी भारतीय नागरिकों के नाम रजिस्टर में शामिल होना निंतात जरुरी है।

जिनके नाम छूटे हैं उनके नामों को शामिल करके ही फाइनल रजिस्टर बनाने की जरूरत है जो सुप्रीम कोर्ट कर रहा है। सभी सुप्रीम छूटे लोगों के नाम शामिल करने का मौका दे रहा तब राजनैतिक पिपासा पूरी करने के भड़काऊ उत्तेजक बयान अथवा भाषण देना तथा असम के लोगों अपने राज्य में बसाने जैसी बातें कहना कतई राष्ट्रहित में नहीं कही जायेगी।

जैसा कि संसद में अमित शाह जी ने कहा कि हम अभी निकाल नहीं बल्कि पचास साल में पहली पता लगा रहे हैं कि कितने बाहरी हैं अभी निकाल नहीं रहे हैं।बांगलादेशी घुसपैठियों को उनके देश वापस करना देशहित में है लेकिन वह तब जब बांगलादेश उन्हें अपना नागरिक मानकर लेने के लिए तैयार हो।

अगर वह भी लेने को तैयार नहीं होता है तो निश्चित तौर पर यह बांगलादेशी भी रोंहिग्या मुसलमानों की तरह धोबी के कुत्ते की तरह न यहाँ के रहेगें और वहाँ के ही रहगें।पक्षधर को भी शायद गले लगाकर भारतीय नागरिकता दिलाना चाहते हैं। कल इसी मुद्दे को लेकर संसद के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर हंगामा शोरशराबा हाथापाई नारेबाजी होती रही।

असम की सरकार के अगुवा मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल असम में सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में बने नेशनल सिटीजन रजिस्टर के दूसरे और अंतिम ड्राफ्ट जारी होने के दिन को ऐतहासिक बताते हुए कहते हैं कि यह दिन लोगों के दिमाग में अविस्मरणीय रहेगा। उनके मुताबिक इस राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर लोग बांग्लादेशी घुसपैठियें हैं और अवैध रूप से रह रहे हैं।

उन्होंने कहा कि असम में अवैध रूप से रह रहे लोगों को निकालने के लिए सरकार ने नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स अभियान चलाया है जो दुनिया के सबसे बड़े अभियान के रूप में है। उन्होंने कहा कि अभियान का मात्र उद्देश्य ऐसे घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें उनके देश वापस भेजना है। उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों खासतौर पर ममता बनर्जी दीदी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और उनका मानना है कि ऐसा करने से गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो जायेगी।

दीदी का गुस्सा जायज भी है क्योंकि उन्होंने ने भी असम की तरह अपने यहाँ पर घुसपैठियों को पनाह दे रखी है जो राज्य में अंशाति मचाये हुये हैं।उन्हें असम की तरह अपने यहाँ पर भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनने की आशंका सताने लगी है। असलियत तो यह है कि जिन लोगों ने इन घुसपैठियों को अपने राज्यों में अपने वोटबैंक को बढ़ाने में लिये सरंक्षण दिया है वहीं अपने वोटबैंक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट एवं सरकार दोनों ने कहा कि इसके बावजूद जो लोग अपनी मूल नागरिकता का प्रमाण दे देगें उनके नाम रजिस्टर में शामिल कर लिये जायेगें। यह सही है कि बांग्लादेश पाकिस्तान का एक हिस्सा रहा है और वहाँ पर पूरे पाकिस्तान के लोगों की नाते रिश्तेदारी है।

जो भी बांगलादेशी घुसपैठिए असम या बंगाल आदि राज्यों में बसे हैं निश्चित ही उनके सम्बंध पाकिस्तान से होना स्वाभाविक है। ऐसे में जान बूझकर आस्तीन में साँप पालना या साँप को दूध पिलाना उचित एवं राष्ट्रहित में नहीं होगा और इस पैदा हुए कैंसर को आपरेशन करके अलग करना ही होगा भले ही आपरेशन में थोड़ी तकलीफ हो। ????????