कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में बीजेपी का मुकाबला करने के लिए विपक्षी एकता पड़ी खतरे में

सहारनपुर । भाजपा के वरिष्ठ सांसद बाबू हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई सहारनपुर मंडल की कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव की राजनीतिक दलों की ओर से तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण कैराना लोकसभा सीट का चुनाव का नतीजा 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले इस मायने में बहुत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश की दो महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की हार हो चुकी है।

भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बीच बीजेपी का मुकाबला करने के लिए विपक्षी दल एकता की भरसक कोशिशें कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश राज्यसभा के चुनाव में सपा-बसपा-कांग्र्रेस-रालोद एकजुट होकर यह साबित कर चुके हैं कि वे लोकसभा चुनावों में भी एकजुटता के चलते मुकाबला कर सकते हैं। भाजपा की रणनीति के कारण इस तरह से बसपा उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव में पराजित हुआ है उससे विपक्षी दल आहत और घायल हैं।

सहारनपुर के प्रभावशाली युवा मुस्लिम नेता और प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष का नाम कैराना सीट से चुनाव लड़ने के रूप में जिस तेजी के साथ सामने आया है उसने सभी दलों के कान खड़े कर दिए हैं। इमरान मसूद ने आज मीडिया में बयान देकर कहा कि यदि विपक्षी दल उन्हें संयुक्त प्रत्याशी के रूप में कैराना से चुनाव लड़ाते हैं तो वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। दिलचस्प यह है कि 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा के बाबू हुकुम सिंह 50.54 फीसद वोट लेकर जीते थे।

उस वक्त कैराना लोकसभा सीट पर 73 प्रतिशत मतदान हुआ था और कुल 11 लाख, 19 हजार, 324 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था, जिसमें भाजपा के हुकुम सिंह को 5 लाख, 65 हजार 909 वोट, सपा के नाईद हसन को 3 लाख, 29 हजार, 081 वोट, बसपा के कंवर हसन को 1 लाख, 60 हजार, 414 वोट और रालोद$कांग्रेस उम्मीदवार करतार सिंह भंडाना को केवल 42,706 वोट प्राप्त हुए थे।

विपक्षी दलों को संयुक्त रूप से 49.46 प्रतिशत वोट मिले थे। जाहिर है यदि उपचुनाव में विपक्षी होती है, जिसकी संभावना है और मत प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में 73 प्रतिशत से कम होता है तो भाजपा के लिए चुनाव जीतना मुश्किल होगा। कैराना लोकसभा सीट में दो विधानसभा सीटें नकुड और गंगोह सहारनपुर जिले में आती हैं और दोनों भाजपा के पास है। तीन विधानसभा सीटें शामली जिले में आती हैं कैराना, थाना भवन और शामली में से थाना भवन और शामली पर भाजपा का कब्जा है।

कैराना विधानसभा सीट से सपा के विधायक नाईद हसन हैं। थाना भवन से भाजपा विधायक ठाकुर सुरेश राणा, प्रदेश की योगी सरकार में गन्ना राज्यमं़त्री स्वतंत्र प्रभार हैं। इसी तरह से सहारनपुर के नकुड सीट के विधायक डा. धर्म सिंह सैनी भी योगी सरकार में राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार हैं। रालोद के प्रदेश अध्यक्ष सहारनपुर दौरे के दौरान चै. जयंती सिंह की उम्मीदवारी की घोषणा कर चुके हैं और आज ही प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष इमरान मसूद का नाम सामने आया है।

यदि ये दोनों भी उपचुनाव में उम्मीदवार बनते हैं तो फिर भाजपा के लिए सीट निकालना आसान हो जाएगा। लेकिन यदि संयुक्त विपक्ष की ओर से अकेले जयंत चौधरी या इमरान मसूद लड़ते हैं तो भाजपा को गोरखपुर और फूलपुर के नतीजे की तरह से पराजय से सब्र करना पड़ सकता है। कैराना लोकसभा सीट मुस्लिम, जाट और गूर्जर बहुल है। बसपा चूंकि उम्मीदवार खड़े नहीं करती है तो दलितों के वोट विपक्षी उम्मीदवार के खाते में ही जाएंगे।

पिछले लोकसभा चुनाव में सहारनपुर सीट से भाजपा के विजयी सांसद राघव लखनपाल शर्मा के सामने कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने 4,17,816 वोट प्राप्त किए थे। जबकि भाजपा के राघव लखनपाल शर्मा को 4,66,261 वोट मिले थे। बसपा के जगदीश राणा को 2,36,689 वोट मिले थे। जगदीश राणा वर्तमान में भाजपा में शामिल हैं।

समाजवादी उम्मीदवार सदान मसूद को 52726 वोट मिले थे। सदान मसूद और इमरान मसूद चचेरे भाई हैं। इस सीट पर भी सपा-बसपा-कांग्रेस वोट मिला दिए जाएं तो भाजपा कम से कम ढाई लाख वोटों से पिछड़ सकती है। जाहिर है सपा-बसपा-कांग्रेस के गठबंधन होने की हालत में भाजपा को नई रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।