Our brand is a crisis
रवीश कुमार
अमरीका में तो चौदह साल ये फ़िल्म आ गई थी, नाम है Our Brand is a crisis. । फ़िल्म की कहानी Jane bodnie के किरदार पर आधारित है जो अमरीका में प्रचार रणनीतियों और प्रबंधन के काम में माहिर मानी जाती है । जेन को बोलिविया के एक नेता की तरफ से बुलावा आता है जो अपनी नकारात्मक छवि से उबरने की कोशिश कर रहा है । फ़िल्म आपको दिखाती है कि कैसे लोकतंत्र का मुखौटा ओढ़ कर, चंद हफ़्तों के भीतर नाटकीय ढंग से चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ा जाता है और जीतने वाला बाद में तानाशाह निकल जाता है । टैक्स बढ़ा देता है और अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों को मानने लगता है और जिस जनता ने उसे चुना है उसी पर ज़ुल्म ढाता है ।
फ़िल्म 2002 की है । जेन की टीम के सदस्य चर्चा कर रहे हैं कि बोलिविया में चुनाव हो रहे हैं । अर्थव्यवस्था संकट में है और लोकतंत्र पर ख़तरा मँडरा रहा है । हमें जिसके प्रचार का काम मिला है वो काफी पैसा दे रहा है लेकिन एक नंबर का अवसरवादी नेता है जो राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा हो रहा है । फ़िल्म का एक एक सीन याद रखने लायक है । जेन की टीम आते ही कह देती है कि उस नेता के प्रति लोगों की राय अच्छी नहीं है । वह टीवी कैमरों का सामना नहीं कर पाता है । लाखों लोगों के सामने बोल नहीं पाता । जेन की टीम देखती है कि कैसे बोलिविया में जगह जगह प्रदर्शन हो रहे हैं । एक नेता की तलाश हो रही है जो बोलिविया को इस संकट से मुक्ति दिला सके और फिर कास्टीयो को मुक्तिदात के रूप में उतार दिया जाता है ।
फ़िल्म में नेता का नाम है कास्टीयो । टीम पहली ही बैठक में बता देती है कि आपका कोई चांस नहीं है । आपकी छवि अच्छी नहीं है । जरूरी है कि हम आपके प्रचार अभियान में लोगों की आवाज़ शामिल करें और छवि को बदल दें । जेन को पता है कि यह नहीं जीतेगा लेकिन वह अपने व्यावसायिक मिशन पर है । उसका एक मन बार बार कहता भी है कि यह मुल्क के लिए अच्छा नहीं है लेकिन पेशेवर मन झूठ और नाटकीयता का सहारा लेकर कोस्टीयो को चर्चा के केंद्र में ला देता है । नए नए प्रतीक ढूँढे जाते हैं । तय होता है कि मज़दूरों को प्रभावित करने के लिए कैसे उनके जीवन से जुड़ी चीज़ों के बारे में बात करनी है । किस्से गढ़े जाते हैं । तर्क की जगह कल्पना ले लेती है । बक़ायदा उसकी टीम कास्टीयो को बताती है कि कैमरे के सामने कैसे पेश आया जाता है । कैसे उसे एक बच्ची को बचाना है ताकि उसकी छवि अवतार पुरुष के रूप में पेश किया जा सके ।
प्रचार टीम की सबसे खास बात है कि जब वो देखती है कि कास्टीयो में कोई दम नहीं है तो वह बोलिविया के संकट को ही ब्रांड बना लेती है । बोलिविया संकट में है और कास्टीयो को उसके उद्धारक के रूप में पेश किया जाता है । जेन कहती है कि यह इतना बेकार नेता है कि जब भी देखती हूँ मुझे उल्टी आती है ।
कास्टीयो को साहसिक बताने के लिए एक सीन प्रायोजित की जाती है । कास्टीयो जब लोगों से मिल रहा होता है तभी उस पर कोई अंडा फेंकता है । कास्टीयो ग़ुस्से में उसे मार बैठता है । अब इस घटना को मौके में बदलने की रणनीति बनती है । बक़ायदा कास्टीयो को बताया जाता है कि वो अपनी क़मीज़ की बाँह मोड़ ले और प्रेस के बीच जाकर कहे कि घटना का अफ़सोस तो है मगर बोलिविया के लिए वो अब बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं । इस एक प्रेस कांफ्रेंस से कास्टीयो की रेटिंग बढ़ने लगती है और वह चर्चा के केंद्र में आने लगता है ।
रणनीति बनती है कि यह चुनाव नहीं है । यह एक संकट है । हम इस संकट को बेचेंगे । हमारा नेता अहंकारी है, मिलनसार नहीं है लेकिन वो फ़ाईटर है । वही इस देश को बचायेगा । सामाजिक आर्थिक संकट से सिर्फ वही बचा सकता है । आप याद करेंगे तो भारत में प्रचार तंत्र अब यही करने लगे हैं । सबकुछ एक चेहरे के आसपास बुना जाता है । उसे देवदूत के रूप में पेश किया जाता है । सारी बात चाल-ढाल तक सीमित कर दी जाती है । नीतियों पर चर्चा नहीं होती । वो कैसा है इस पर बहस केंद्रीत हो जाती है । इस फ़िल्म का एक एक सीन भारत के चुनावी क़िस्सों से जा मिलता है । ऐसा नहीं है कि चुनावी हार और जीत सिर्फ प्रबंधन का नतीजा है लेकिन इनकी बढ़ती भूमिका को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता ।
एक जगह जब लोग कास्टीयो की बस पर हमला कर देते हैं तो वह उनके बीच चला जाता है । प्रदर्शनकारी प्रोफेसर से बहस करता है और भरोसा देता है कि बोलिविया को अमरीका के हाथों गिरवी नहीं रखेगा । यहीं पर वो एक नौजवान से कहता है कि नेता पिता की तरह होता है । कभी वह जनता से सख़्ती करता है तो कभी उसे प्यार करता है । नौजवान उसकी इस बात पर दिल लुटा बैठता है और उसकी जीत के लिए और अधिक निष्ठा से काम करने लगता है । जेन बार बार खुद क दिलासा देती है कि वो सिर्फ एक प्रोफ़ेशनल काम कर रही है । एक आदमी उसे सतर्क भी करता है कि इसके पीछे ड्रग्स कार्टेल है । लेकिन वो बस यह समझ कर किये जा रही है कि उसने जीताने का ठेका लिया है
कास्टीयो मामूली अंतर से जीत जाता है । जीतते ही प्रचार टीम को अपने से अलग कर देता है । वो लड़का जो उससे काफी प्रभावित था, एक तोहफ़ा लेकर जाता है लेकिन जीत के बाद अधिकारियों से घिरा कास्टीयो ऐसे देखता है जैसे कभी मिला ही न हो । लड़के को सदमा लगता है । जेन इस जीत से ख़ुश नहीं है । वो और उसकी टीम के सदस्य बोलिविया से जाने के लिए रवाना हो रहे हैं ।
तभी देखते हैं कि कास्टीयो की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं । पुलिस उन पर लाठी बरसाती है । कास्टीयो तानाशाह साबित होता है । अब वो लड़का कास्टीयो के खिलाफ प्रदर्शनकारियों की टोली में शामिल हो जाता है । जेन भी कार से उतर कर लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में शामिल हो जाती है ।
फ़िल्म एक सबक है । हमलोग देर से जागते हैं । यह फ़िल्म गहरी नींद से एक झटके की तरह जगाती है । प्रचार प्रबंधकों के दम पर जनता के बीच नेता के प्रति जुनून तो पैदा किया जा सकता है लेकिन क्या वो नेता जनता के लिए है भी । लोकतंत्र के सवालों का गलाघोंट कर आखिर वो किस लोक के लिए देवदूत के रूप में गढ़ा जाता है । जेन तो अपनी जीत पर प्रायश्चित करने चली जाती है मगर अक्सर ऐसा नहीं होता । ओबामा के राष्ट्रपति बनने के पीछे प्रचार की ऐसी ही कहानी है । audacity to win नाम से किताब है जो उनके प्रचार प्रबंधकों ने लिखी थी । पढ़ियेगा । मैंने फ़िल्म की कहानी ही लिख दी ताकि आप न देखकर भी कुछ तो देख सकें ।