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क्यों पेरिस में हुआ जलवायु समझौता भारत के लिए राहत की सांस लेकर आया है

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भारत का यह आग्रह मान लिया गया कि विकसित देश ही तापमानवर्धक गैसों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार रहे हैं, इसलिए उनके दुष्प्रभावों से लड़ने में उन्हें ही सबसे ज्यादा जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी.
दो दशक से भी ज्यादा वक्त तक चली जद्दोजहद के बाद पेरिस में दुनिया के 195 देशों में एकराय बन गई. जलवायु परिवर्तन की रोकथाम की दिशा और दायित्व तय हो गए. सभी देशों ने माना कि औसत वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को किसी भी हालत में दो डिग्री सेल्सियस से आगे नहीं जाने देना है. बल्कि कोशिश करनी है कि यह आंकड़ा 1.5 डिग्री तक ही रहे. इसके लिए तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस और दूसरी गैसों के उत्सर्जन में कटौती संबंधी खाका भी तैयार है.
समझौते का जो स्वरूप बना है उससे भारत और उसके साथी विकासशील देश भी राहत की सांस ले सकते हैं. जिम्मेदारी के लिहाज से विकसित और विकासशील देशों के बीच अंतर कम करने का उनका आग्रह मान लिया गया है. भारत का आग्रह यह था कि विकसित देश ही तापमानवर्धक गैसों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार रहे हैं, इसलिए उनके दुष्प्रभावों से लड़ने में उन्हें ही सबसे ज्यादा जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी.

‘जलवायु से जुड़े न्याय का तकाज़ा है कि कार्बन उत्सर्जन के लिए अब जो थोड़ी-सी जगह रह गई है, उसमें विकासशील देशों को अपने विकास की पर्याप्त गुंजाइश मिले.’

अमेरिका और यूरोप के तमाम देश तो विकास की राह पर बहुत आगे निकल चुके हैं. इस प्रक्रिया में उन्होंने पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया. अब जब भारत जैसे विकासशील देशों की बारी आई है तो उत्सर्जन में कटौती के कठोर मानक उनकी विकास प्रक्रिया को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस सम्मेलन की शुरुआत में अपने भाषण में ही कह दिया था कि ‘जलवायु से जुड़े न्याय का तकाज़ा है कि कार्बन उत्सर्जन के लिए अब जो थोड़ी-सी जगह रह गई है, उसमें विकासशील देशों को अपने विकास की पर्याप्त गुंजाइश मिले.’
यही वजह है कि सम्मेलन की वार्ताओं के दौरान भारत ने अपना रुख पर्याप्त रूप से कड़ा रखा. उसने साफ कर दिया कि विकसित देश आर्थिक सहायता और आधुनिक तकनीक देने में जितनी उदारता का परिचय देंगे, वह भी तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन में कटौती के प्रश्न पर उतनी ही दूर तक जाने के लिए तैयार रहेगा. इस वजह से भारत की काफी आलोचना भी हुई. विकसित देशों के खेमे ने उसे बार-बार जिद्दी कहकर उस पर दबाव बनाने की कोशिश की. लेकिन भारत अपने रुख पर अड़ा रहा.
भारत का महत्वाकांक्षी संकल्प
भारत अपनी सवा अरब जनसंख्या के कारण दुनिया में कार्बन डाईऑक्साइड का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक भले ही बन गया है, लेकिन उसका प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन (1.9 टन प्रतिवर्ष) अमेरिका के दसवें हिस्से के बराबर है. बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 1000 इकाई के बराबर है, जबकि अमेरिका में वह 13000 इकाई के बराबर. तब भी भारत ने पेरिस सम्मेलन को दी गई अपनी स्वैच्छिक कटौती घोषणा में कहा है कि वह 2030 तक अपनी 40 प्रतिशत बिजली ‘अजीवाश्मीय’ वैकल्पिक स्रोतों से पैदा करेगा. यदि ऐसा हो पाता है, तो यह भारत के इस समय के सकल बिजली उत्पादन के बराबर होगा.

विकसित देश आर्थिक सहायता और आधुनिक तकनीक देने में जितनी उदारता का परिचय देंगे, भारत भी उत्सर्जन में कटौती के प्रश्न पर उतनी ही दूर तक जाने के लिए तैयार रहेगा.

यदि ऐसा नहीं हो पाता, तब भी 2030 तक भारत में कार्बन डाईऑक्साइड का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन अनुमानतः 4 से 5 टन होगा, जो कि तब तक अमेरिका और चीन में 12 टन के बराबर अनुमानित उत्सर्जन के आधे से भी कम होगा. कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत यदि चाहे, तो वह अपना कटौती-लक्ष्य और कम भी रख सकता है. पेरिस सम्मेलन की सफलता-विफलता के लिए भारत एक निर्णायक देश इसलिए भी बन गया कि वह अकेला नहीं था. विकासशील देशों का जी-77 ग्रुप भी उसके साथ था, भले ही इस ग्रुप में दरारें भी पड़ गई हैं.
तेल की कमाई के बल पर ऐय्याशी करने वाले सउदी अरब और कई दूसरे तेल निर्यातक देश नहीं चाहते थे कि जलवायु-परिवर्तन की रोकथाम के नाम पर तापमान में वृद्धि की सीमा को दो से घटा कर डेढ़ डिग्री कर दिया जाए. इस लक्ष्य को पाने के लिए सौर, पवन या जैव ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों को इतना बढ़ावा मिलने लगे कि उनका तेल बिकना और भी कम होता जाए. इसी तेल के बल पर, उदाहरण के लिए, क़तर में कार्बन डाईऑक्साइड का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 40 टन के बराबर है, जोकि विश्व में सबसे अधिक है. तेल उत्पादक देशों के गुट को संतुष्ट करने के लिए समझौते में कहा गया है कि 2050 के बाद से उतनी ही तापमानवर्धक गैसें वायुमंडल में उत्सर्जित की जा सकती हैं, जितनी वनरोपण व तकनीकी साधनों द्वारा वायुमंडल में से घटाई जा सकेंगी.