मुरैना के योगिनी मंदिर की प्रतिरूप है भारत का संसद भवन

वास्तुशिल्प के मामले में भारत की बेहतरीन इमारतो में से एक ब्रिटिश काल में बनी संसद भवन की इमारत मुरैना के प्राचीन योगिनी शिव मंदिर का प्रतिरूप है। देश की इस प्रसिद्ध इमारत का निर्माण ब्रिटिश वस्तुविद सर ऐडविन लुटियंस द्वारा मुरैना के इस प्राचीन तंत्र साधना के केन्द्र के आधार पर की गई थी।

ग्वालियर से मुरैना सड़क के समीप एक पहाड़ी पर स्थित इस प्राचीन मंदिर का निर्माण प्रतिहार राजाओ द्वारा 9 वी सदी के आसपास किया गया था। जिले की मितावली पंचायत के अंतर्गत आने वाले इस गोलाकर मंदिर के भीतरी भाग में 101 खंबो के मध्य बनी कोठरियो में चौसठ योगिनीयो की पाषाण प्रतिमाओ को स्थापित किया गया था।

कोठिरियो के प्रवेश द्वार पर शिवलिंग स्थापित किये गये थे, परंतु समय के साथ पाषाण कोठिरियो में स्थापित अधिकांश योगिनी प्रतिमाये या तो चोरी हो चुकी या संग्रहालयो में पहुँच चुकी है। प्राचीन काल तंत्र साधना का केन्द्र रहे इस इकंतेश्वर मंदिर को तात्रिको का विश्वविद्यालय भी कहा जाता है।

जहाँ विभिन्न स्थानो से तंत्र साधना एवं शिक्षा के लिए तांत्रिक एकत्र होकर तप, यज्ञ सहित अन्य विधान संपन्न करते थे।मंदिर के मध्य में बने पत्थरो के गोलाकर मंदिर में विशाल शिवलिंग स्थापित है। तंत्र साधना के लिए इस मंदिर में आज भी दूर दूर से आने वाले साधक अपने अनुष्ठान संपन्न कराते है।

इस मंदिर को आधार मानकर 1921 में ब्रिटिश ब्रिटिश वस्तुविद सर ऐडविन लुटियंस एवं सर हर्बर्ट बेकर द्वारा दिल्ली में ब्रिटिश गवर्नर जनरल के लिए 144 खंबो वाली शाही गुम्मदाकर इमारत सेन्ट्रल हाल का निर्माण किया गया था जो 1927 में पूर्ण हुई थी। 83 लाख की लागत से निर्मित इस इमारत का लोकार्पण गवर्नर जनरल लार्ड इरविन द्वारा किया गया था।

देश की आजादी के बाद अस्थाई सरकार को सत्ता के हस्तांतरण की गवाह रही इस इमारत में बैठकर ही भारत के संविधान की रचना की गई थी। बाद में इसी खूबसूरत इमारत को भारत गणराज्य की सर्वोच्च संस्था लोकसभा की कार्रवाई के लिए संसद भवन के रूप में चुना गया था।स्वदेशी वस्तु शिल्प का अनुपम नमूना देश का शक्ति केन्द्र इस ससंद भवन की इमारत को देखने के लिए पर्यटक दूर दूर से आते है।