एक पिता की व्यथा सुनकर पुलिस द्वारा मज़ाक उड़ाया गया

जबलपुर@ शहर मे अपनी लाड़ली की खोजख़बर मे भटक रहे पिता की व्यथा सुनकर किसी का भी दिल पिघल जाए,मगर जब उनका दर्द सुनने वाला कोई न होकर मज़ाक उड़ाया जाए तो क्या हाल होगा एक पिता का। 3 फरवरी की रात जब पता चला कि नेहा और काजल का कुछ पता नहीं चल रहा, तो हम लोगों ने माढ़ोताल थाने पहुंचकर गुमशुदगी दर्ज कराई थी। 4 फरवरी से हम लोग दिन में कई बार थाने जाते थे, लेकिन वहां मौजूद पुलिसकर्मी हमारी तरफ देखकर हंसते हुए मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि किसी ने कुछ नहीं किया होगा। दोनों भाग गईं होंगी किसी के साथ। मैहर से शहर पहुंचे मृत इंजीनियरिंग छात्रा नेहा नामदेव के पिता रामायण नामदेव ने रोते हुए पुलिस के अमानवीय रवैये की दास्तां सुनाई।

रामायण के अनुसार उसकी आर्थिक स्थिति काफी खराब है, लेकिन नेहा के इंजीनियर बनने के सपने को वो हर हाल में पूरा करना चाहता था। जिसके लिए वह दिन रात कड़ी मेहनत करता था। लेकिन नेहा की मौत के बाद वह बुरी तरह टूट चुका है। रामायण ने माढ़ोताल थाने में अपने साथ हुए व्यवहार के बारे में काफी देर तक चर्चा की। रामायण का कहना था कि 3 फरवरी से आज तक कई ऐसे माता-पिता से उसकी मुलाकात हुई जिनकी बेटियां और बच्चे लापता हुए थे। पुलिस मदद करने की बजाय हर किसी का उसी तरह मजाक उड़ाती थी जैसे उसके साथ।

इस मामले में भेड़ाघाट पुलिस ने भी असंवेदनशीलता का परिचय दिया। सरस्वतीघाट में लाश मिलने के बाद शवों को नदी से बाहर निकलवाने के बाद उन्हें बांसों में मृत जानवरों की तरह बांधकर एम्बुलेंस तक पहुंचाया गया। रामायण नामदेव की गरीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब नदी से नेहा और काजल की लाशें निकलवाईं गईं तो गोताखोरों और स्वीपरों ने डेढ़-डेढ़ हजार रुपए मांगे। लेकिन रामायण के पास एक भी पैसा नहीं था, उसने अपने रिश्तेदारों से उधारी मांगी,तब जाकर सिर्फ एक हजार रुपए ही एकत्रित हो पाए।