गहन अध्ययन के बाद तैयार किया प्रोटोकॉल, लोगों को करना चाहिए इस्तेमाल : आयुष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा
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कोरोना महामारी से उबरने में पूरी दुनिया जुटी हुई है। भारत में भी कोरोना के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं

नई दिल्ली। कोरोना महामारी से उबरने में पूरी दुनिया जुटी हुई है। भारत में भी कोरोना के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। राहत की बात है कि देश में न केवल एक्टिव मरीजों की संख्या कम हो रही है बल्कि इससे होने वाली मृत्यु की संख्या में भी काफी कमी आई है। देश में चिकित्सीय सेवा के बेहतर होने के साथ साथ आयुर्वेदिक उपचार ने भी खासा असर छोड़ा है।

कोरोना संक्रमण से बचने और इसके उपचार में बेहतर प्रबंधन में योग और आयुर्वेदिक उपचार काफी सहायक सिद्ध हो रहे हैं। इस संबंध में हाल ही में आयुष मंत्रालय ने लोगों के लिए विस्तृत प्रोटोकॉल जारी किया है। आयुष मंत्रालयों के इन्हीं उपायों और नए प्रयास के बारें में आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा से हिन्दुस्थान समाचार की विशेष संवाददाता विजयलक्ष्मी ने की खास बातचीत। इसी साक्षात्कार के प्रमुख अंश

कोरोना से बचाव व इसके उपचार के बेहतर प्रबंधन के लिए योग व आयुर्वेद काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। इस दिशा में प्रोटोक़ॉल जारी किया है। अश्वगंधा, गुडुची और गिलोए के असर के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण भी दिए हैं। इन प्रोटोकॉल के बारे में विस्तार से बताएं।

आयुष मंत्रालय ने प्रोटोकॉल में योग,काढ़ा, और दवाइयां बताईं है जिनके इस्तेमाल से लोगों को कोरोना संक्रमण से बचे रहने और बीमारी होने की सूरत में उससे लड़ने की इम्युनिटी प्रदान करती है। इस संबंध में वैज्ञानिक प्रमाण भी हैं। इन सभी उपायों को देश की वैज्ञानिक संस्थाओं ने परखा है। हमारे सारे उपाय और चिकित्सा पद्धतियां प्रभावी साबित हुई हैं।

उदाहरण के लिए आयुष मंत्रालय दिल्ली पुलिस के साथ एक अध्ययन किया है जिसमें हमने 80 हजार जवानों को शामिल किया। आयुष ने इन सभी लोगों को एक महीने के लिए काढ़ा, अणुतेल, च्यवनप्राश, गिलोय और अश्वंगधा की गोलियों का सेवन करवाया। एक महीने के बाद पाया गया कि दिल्ली पुलिस में कोरोना के मामले चार गुना कम हो गए जबकि दिल्ली में कोरोना के मामले दो गुना बढ़ गए थे। इसी तरह मृत्युदर भी भी भारी गिरावट देखने को मिली।

यह अध्ययन 20 जुलाई से 19 अगस्त तक किया गया था। इन नतीजों के कारण आय़ुष ने दिल्ली पुलिस की कॉलोनियों में धनवंतरी रथ की शुरुआत की है। इसके तहत आयुष के चिकित्सक उन कॉलोनियों में जाते हैं और आयुर्वेद के उपचारों के बारे में जानकारी देते हैं और साथ ही चिकित्सीय परामर्श भी देते हैं। इसके साथ आय़ुष के कोविड सेंटर में ढाई महीने में 250 लोगों पर एक अध्ययन किया गया। सरिता विहार कोविड सेंटर में इस दौरान कोरोना से किसी की भी मौत नहीं हुई और न ही आयुष का कोई स्वास्थ्य कर्मी बीमारी हुआ। हमने इन सभी अध्ययन का डॉक्यूमेंटशन किया है।

तीसरा उदाहरण मध्यप्रदेश से है जहां कई हजार लोगों को कोरोना के उपचार में काढ़ा, गिलोय के टैबलेट दिए गए वे लोग जल्दी ठीक हो गए हैं। कोरोना का सटीक उपचार बेशक नहीं सामने आया हो लेकिन इसके प्रभाव को कम करने के लिए उपचार के मैनेजमेंट जरूर तलाश लिया गया है। भांप लेने, काढ़ा के नियमित सेवन से कोरोना के मरीज जल्दी ही स्वस्थ्य हो गए हैं। इसके प्रमाण भी जुटाएं गए हैं। इसी तरह कंटेनमेंट जोन में होमियोपैथी, य़ूनानी चिकित्सा पद्धतियों पर भी अध्ययन किया गया है वहां भी नतीजे सकारात्मक आएं हैं।

इसके साथ शरीर में रोग से लड़ने की शक्ति के परीक्षण पर भी एक अध्ययन किया गया है। इसके तहत संजीवनी एप-में 31 जुलाई से 1.47 करोड़ लोगों का सर्वे किया गया। इस सर्वे में पाया गया कि 85 प्रतिशत लोग आयुष का काढ़ा ले रहे हैं। उनकी जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार आया है। इसी तरह यूनानी, नेचुरोपैथी के भी अच्छे नतीजे प्राप्त हो रहे हैं। अशवगंधा में 550 से ज्यादा अध्ययन किए जा रहे हैं। पीपली में 250 से ज्यादा अध्ययन हैं। यह सब प्रमाण है कि आयुष में बहुत प्रभावी काम हो रहा है।

इन सब उपायों से कोरोना से बचाव और उसके प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी। इसे हम कोरोना का सटीक इलाज क्यों नहीं कह पा रहे हैं।
देखिए कोरोना का इलाज अब तक नहीं खोजा जा सका है, लेकिन इलाज तो हो रहा है। लोग ठीक भी हो रहे हैं। आयुष ने इसी बात को सिद्ध किया है कि आयुर्वेद के इलाज से लोगों को लाभ हो रहा है। आयुष ने इसे वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध किया है कि आश्वगंधा, गिलोय, गुडुची लेने लोगों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी हैं। लोगों ने आयुर्वेद के इन उपायों को दिल से अपनाया है। दूसरी बात गुडुची और अश्वगंधा हाईड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की तरह काम करती हैं। बल्कि गुडुची और अश्वगंधा ज्यादा असरदार है। हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा के तो कई साइड इफेक्ट्स हैं लेकिन इनके कोई साइड इफेक्ट्स नहीं है।

क्या विदेशों में भी अध्ययन की शुरुआत की जा रही है।
जी हां। कई देशों के साथ आयुष चिकित्सा पद्धतियों पर अध्ययन चल रहा है। हम लोग अश्वगंधा पर यूके की पब्लिक हेल्थ की विश्वविद्यालय के साथ एक स्डडी कर रहे हैं। ब्राजील के साथ भी इसी पर अध्ययन की शुरुआत की गई है। ब्रिक्स प्लेटफार्म पर साउथ अफ्रीका, इजरायल के साथ बातचीत चल रही है। इसके साथ अमेरिका की भी यूनिवर्सिटी अध्ययन को इच्छुक है। इन सभी के साथ कॉमर्स के क्षेत्र में आयुष की दवाइयों की बिक्री में काफी उछाल देखने को मिल रहा है। पिछले छह महीनों में अश्वगंधा की बिक्री में पांच गुना की बढ़ोतरी हुई है। च्यवनप्राश, अश्वगंधा, गिलोए की गोलियों की बिक्री भी 300-700 प्रतिशत बढ़ गया है। अश्वगंधा की कीमतों में ढाई गुना बढ़ोतरी हुई है। आयुष मंत्रालय किसानों से भी बात कर रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अश्वगंधा उगाएं। लोगों को बीमारियों से बचाएं रखने के लिए सिर्फ 200-300 रुपये में किट तैयार किए गए हैं।

ऐसी कौन सी गैर संक्रामक बीमारियां हैं जिन पर आयुष ने काम किया है।
आयुष पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में करीब 25000 पब्लिकेशन मौजूद है। आयुष ने गैरसंक्रामक बीमारियों पर काफी काम किया है। जैसे कैंसर, जोड़ा का दर्द, डेंगू इन सभी बीमारियों के इलाज में अध्ययन किया गया। मौजूदा समय में सबसे ज्यादा अध्ययन यानि तकरीबन 61 प्रतिशत अध्ययन आयुष से किए जा रहे हैं। हाल ही में हमने योग पर अध्ययन किया गया है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत छह जिलों में 10 लाख लोगों पर अध्ययन किया गया है। एम्स के साथ कैंसर पर भी अध्ययन किया गया है। आईसीएमआर के साथ डेंगू पर भी अध्ययन किया गया है। आय़ुष ने जर्मनी के साथ ऑर्थराइटिस पर अच्छा काम किया है। घुटनों के दर्द को कम करने के लिए मसाज और अश्वगंधा का प्रयोग आठ हफ्तों तक किया गया। आर्थराइटिस के मरीजों को अच्छे लाभ मिले। इस अध्ययन को यूरोप में काफी सराहा गया। लेकिन हम लोग इसकी ज्यादा मार्केटिंग नहीं करते।

काफी प्राचीन और प्रभावी होने के बावजूद आयुष चिकित्सा पद्धतियों को वैकल्पिक के रूप में ही देखा जाता है। इसका क्या कारण है?
आयुष तो इसी उद्देश्य से काम कर रहा है कि लोग बीमार ही न पड़े। हमें किसी चिकित्सा पद्धति से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी है। आयुष के कई अध्ययन चल रहे हैं और कोरोना काल में ही आयुष को काफी लोकप्रियता मिली है। इसलिए हमें अपनी लकीर को लंबी करते रहना है। आयुष ने हमेशा अपनी चिकित्सा पद्धतियों में वैज्ञानिक आधार को साबित किया है। पीएम मोदी ने मन की बात कार्यक्रम बात में युवाओं का आह्वान किया था। जरुरत यह है कि युवाओं को विज्ञान उनकी भाषा में समझाएं ताकि उन्हें विज्ञान की बेहतर समझ हो।

आयुष मंत्रालय ने देश भर में साढ़े 12 हजार वेलनेस केन्द्रों की स्थापना करने का काम शुरू किया है। अभी देश में कितने वेलनेस सेंटर बनाए जा चुके हैं।
देश में साल 2024 तक साढ़े बारह वेलनेस केन्द्र बनाए जाने हैं। मौजूदा समय में 5000 वेलनेस सेंटर बनाए जा चुके हैं। आयुष मंत्रालय का उद्देश्य है कि लोगों को रोगों से दूर रखना। जिसके लिए आयुष की सभी विद्धाएं काम कर रही हैं। उदाहरण के रूप में साल 1991 में चित्रकूट में नाना जी देशमुख के साथ 500 गांव में काम शुरू किया। गांव में लोगों को स्वस्थ्य रखने के लिए काफी उपाय किए। इन गांवों में शिक्षा, शुद्ध पर्यावरण, शुद्ध पानी, शुद्ध हवा पर ध्यान रखा गया। ग्राम स्वराज के तहत महिलाओं, बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ। इसी तरह अब हम साढ़े 12 हजार वेलनेस केन्द्रों पर भी इसी तरह से सभी उपाय करने की योजना है।