जुगाड़ की गाड़ी में घूम-घूमकर पन्नी बीनने वाले संदीप अब मनरेगा में करेंगे मजदूरी

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जबलपुर । बांस, लोहे के पाईप और साइकिल के पुराने एवं अनुपयोगी हो चुके चकों से जुगाड़ की गाड़ी बनाकर इंदिरा मार्केट के आसपास पन्नी बीनकर गुजारा कर रहा संदीप बर्मन अब अपने गांव के आसपास ही मनरेगा के तहत चल रहे निर्माण कार्यों में मजदूरी कर जीवन यापन करेगा ।

पाटन तहसील के ग्राम कोनी कलाँ के 28 वर्षीय इस युवक की गुरुवार 7 जनवरी को जबलपुर से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र में कबाड़ से बनी चार चकों की गाड़ी के साथ तस्वीर प्रकाशित हुई थी । हालाँकि इस तस्वीर के साथ प्रकाशित समाचार में संदीप को दिव्यांग और चलने-फिरने में अक्षम बताया गया था ।

कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने तस्वीर और उसके साथ प्रकाशित समाचार को संज्ञान में लेते हुये सुबह से ही सामाजिक न्याय विभाग के अमले को इस युवक की तलाश करने में लगा दिया, ताकि उसे तुरन्त ट्राईसाइकिल दिलाई जा सके । कोई पता ठिकाना न होने के कारण कुछ समय लगा लेकिन आखिरकार उसे इंदिरा मार्केट के समीप ढूंढ लिया गया ।

सामाजिक न्याय विभाग ने जब संदीप से उसकी विकलांगता के बारे में पूछा तो उसने जो कुछ बताया वो प्रकाशित समाचार से विपरीत था । संदीप ने स्पष्ट तौर पर बताया कि वो विकलांग नहीं है । बल्कि पूरी तरह स्वस्थ है और दोनों पैरों से चलने-फिरने में सक्षम है ।

उसने चार चकों की यह गाड़ी भी पन्नी बीनने और एकत्र पन्नियों को ढोने में अपनी सुविधा के मद्देनजर बनाई  है । अखबार में छपी तस्वीर और उसके हवाले से छपे समाचार के बारे में पूछने पर उसने बताया कि गाड़ी पर सवार उसका वीडियो बना रहे कुछ लोगों ने उससे प्रेस फोटोग्राफर के सामने झूठ बोलने के लिये प्रेरित किया था । वो सच बताना चाह भी रहा था लेकिन उसे हाथों से इशारा करके रोक दिया गया ।

संदीप को बाद में सामाजिक न्याय विभाग के अमले द्वारा कलेक्टर कर्मवीर शर्मा से भी मिलवाया गया । दरअसल कलेक्टर खुद संदीप से मिलकर वास्तविकता जानना चाह रहे थे । मुलाकात के दौरान कलेक्टर ने पूछा कि क्या उसे अपने गाँव में ही काम मिल जाये तो वो जाना चाहेगा ।

हाँ में जबाब देने पर कलेक्टर ने प्रभारी सयुंक्त संचालक सामाजिक न्याय को तुरन्त संदीप को उसके गाँव भेजने की व्यवस्था करने के निर्देश दिये । साथ ही मनरेगा के तहत चल रहे निर्माण कार्यों में काम दिलाने के लिये कोनी कलाँ के पंचायत सचिव को निर्देशित करने कहा ।

कलेक्टर श्री शर्मा के समक्ष संदीप ने बताया कि करीब दस-बारह साल पहले वो अपना गाँव छोड़कर मुंबई चला गया था । बाद में दिल्ली में भी रहा और शादी- ब्याह के कार्यक्रमों में बर्तन साफ कर जीवन यापन कर रहा था ।

लॉकडाउन के दौरान काम न मिलने के कारण वहाँ से वापस जबलपुर आ गया और यहॉं पन्नी बीनकर और एकत्र पन्नियों को कबाड़ के व्यापारी को बेचकर  गुजरा कर रहा है । उसने बताया कि इंदिरा मार्केट की दुकानों के सामने रात गुजारता है ।

संदीप ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की मदद के लिये आज तक न तो किसी सरकारी कार्यालय गया और न किसी अधिकारी से मिला है । संदीप के मुताबिक वो अशिक्षित है और घर उसका पैन कार्ड, आधार कार्ड और परिचय पत्र मुंबई में गुम हो गया है ।