मुसलमानों के लिए 12 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक लाएगी तेलंगाना सरकार

“तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव ने आज कहा कि मुसलमानों में पिछड़े वर्ग को 12 प्रतिशत आरक्षण देने के लक्ष्य से प्रदेश सरकार विधानसभा के बजट सत्र में विधेयक लाएगी। ”

सदन में अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़ी चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा, आगामी बजट सत्र में ही हम मुसलमान आरक्षण विधेयक लाएंगे। बजट सत्र अगले महीने होने की संभावना है।

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के मुख्य चुनावी वादों में मुसलमानों को 12 प्रतिशत आरक्षण देना शामिल था।

राव ने इस मुद्दे पर एक बयान में कहा, राज्य सरकार ने मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक आयोग का गठन किया था और उसने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।

राज्य सरकार ने रिपोर्ट को पिछड़ा वर्ग आयोग के पास उसके विचार जानने के लिए भेजा है।

राव ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग अपना विचार देने से पहले विभिन्न वर्गों की राय ले रहा है।

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा, मुसलमानों को 12 प्रतिशत कोटा देने के लिए, आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होने की अनिवार्यता में ढ़ील होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, तमिलनाडु सरकार 45..94 अधिनियम लेकर आयी और भारत के संसद की मंजूरी से आरक्षण बढ़ाने के मुद्दे को भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करा लिया। हम अपने राज्य में भी इसी नीति का पालन करेंगे। मुसलमानों को 12 प्रतिशत आरक्षण देने पर केन्द्र का रूख सकारात्मक रहेगा, इसका विश्वास जताते हुए राव ने कहा कि यदि केन्द्र सकारात्मक रूख नहीं अपनाता है तो राज्य सरकार कानूनी रास्ता अपनाएगी।

सदन में भाजपा नेता जी. कृष्ण रेड्डी ने कहा कि उच्च न्यायालय पहले ही फैसला सुना चुका है कि धर्म के आधार पर आरक्षण संविधान के विरूद्ध है।

उन्होंने कहा कि यह मामला उच्चतम न्यायालय में विचारधीन है। अविभाजित आंध्रप्रदेश में मुसलमानों के पिछड़े वर्ग को चार प्रतिशत आरक्षण देने संबंधी मुकदमा उच्चतम न्यायालय में है।

हालांकि, राव ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित आरक्षण इस्लाम धर्म के लिए नहीं है।

उन्होंने कहा, मैंने नहीं कहा कि आरक्षण इस्लाम धर्म के लिए है। मैंने अपने स्पष्टीकरण में साफ कहा है। हमने कहा है कि हम उस नाम के तहत गरीबों के लिए काम करेंगे और आरक्षण लाएंगे।

उन्होंने कहा, आपने (कृष्ण रेड्डी) कहा कि यह अदालत में चल रहा है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो न्यायालय में लंबित हो और उस पर विधानसभा चर्चा नहीं हो सकती या विधेयक पारित नहीं हो सकता। हम चर्चा करने के लिए स्वतंत्र हैं।