दर्शक और धन जुटाना डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं : ऊषा देशपांडे

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भारतीय डॉक्यूमेंट्री निर्माता संघ (आईडीपीए) की अध्यक्षा सुश्री ऊषा देशपांडे ने आज मीडिया सेंटर में मीडिया से बात करते हुए कहा कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों के सामने दर्शकों और धन को जुटाना दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं और इन समस्याओं को दूर करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इस अवसर पर आईडीपीए के महासचिव संस्कार देसाई भी मौजूद थे।

डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों को अवसर प्रदान करने के लिए फिल्म प्रदर्शनों का आयोजन करके, प्रदर्शन के लिए फिल्म क्लबों से संपर्क करके, स्लॉट दिलवाने के लिए टेलीविजन चैनलों से बात करके और देश भर में फिल्म महोत्सवों में हिस्सा लेकर आईडीपीए प्रयास कर रहा है। सुश्री देशपांडे ने कहा कि उनका संघ प्रतियोगिताएं, कार्यशालाएं, सम्मेलन और मास्टरक्लास वगैरह का आयोजन भी करता है।

भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफी) 2018 के दौरान 25 से 27 नवंबर को रोज 1.30 बजे से एक घंटे आयोजित होने जा रहे ‘ओपन फोरम’ की बात करते हुए सुश्री देशपांडे ने कहा कि उसके विषय ये रहेंगे :

  1. बायोपिक फिल्मों पर निर्देशक के विचार – इनमें तथ्य कितने होते हैं, कल्पना कितनी होती है?
  2. आज की फिल्म मेकिंग और उसके असर को लेकर क्या विषय-वस्तु पर तकनीक हावी हो गई है?
  3. सेलफोन हममें से हर किसी को फिल्मकार बना रहे हैं, क्या ये माध्यम इससे आगे बढ़कर समुचित फिल्में बनाने में सक्षम है?

आईडीपीए एक गैर-लाभकारी संगठन है जिसे 1956 में स्थापित किया गया था और ये भारत में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, एनिमेशन फिल्मों, विज्ञापन फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों के निर्माताओं का सबसे बड़ा संघ है। इसके अलावा ये डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों को नियमित जानकारियां देकर, मानकीकृत दरों के कार्ड देकर और उनके विवादों को सुलझाकर उन्हें सेवा प्रदान कर रहा है।

एक न्यास के तौर पर आईडीपीए उस आंदोलन का हिस्सा है जिसमें डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों की विरासत को और आगे ले जाने की कोशिश की जा रही है। संस्कार देसाई ने जानकारी दी कि आईडीपीए का इतिहास अरुणा राजे, माइक पांडे और विजया मुलै जैसे विशिष्ट अध्यक्षों वाला रहा है। इसने फिल्म महोत्सव आयोजित किए हैं और योग्य कुशलता वालों के लिए पुरस्कार स्थापित करवाए हैं। आईडीपीए 1988 में मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (मिफ) की शुरुआत के समय से ही उसके साथ जुड़ा रहा है।

श्री देसाई ने कहा कि वर्तमान में आईडीपीए की सदस्यता किसी भी ऐसे भारतीय फिल्मकार के लिए खुली है जो डॉक्यूमेंट्री, छोटे विज्ञापन, कॉरपोरेट फिल्में या एनिमेशन फिल्में बनाता हो। श्री देसाई ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए आईडीपीए का डीडी नेशनल पर शनिवार रात 10 बजे का एक स्लॉट है।

डॉक्यूमेंट्री फिल्म आंदोलन को प्रोत्साहित करने के लिए मुंबई में और अन्य जगहों पर डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के प्रदर्शन की भी व्यवस्था की जाती है। आईडीपीए ने प्रस्ताव दिया है और समझाने में लगा है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए एक समर्पित चैनल होना चाहिए। विभिन्न फिल्म महोत्सवों की जरूरत के मुताबिक ये पैकेजों का प्रबंधन भी करता है।

ऊषा देशपांडे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) में पटकथा लेखन के पाठ्यक्रम की पूर्व छात्र हैं। वे एक स्वतंत्र निर्माता, निर्देशक और लेखिका हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पर उनकी फिल्म ‘ख़याल’ काफी प्रसिद्ध है।

संस्कार देसाई मुंबई स्थित फिल्मकार, पटकथा लेखक, रंगमंच की हस्ती, गायक और कवि हैं। वे कई वर्षों से मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (मिफ) और भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफी) से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। वे आईडीपीए के महासचिव हैं और उनकी फिल्म ‘स्टेपवेल्स ऑफ गुजरात’ को व्यापक रूप से सराहना मिली थी।