चंदा इकट्ठा कर हो रहा इस सैनिक का इलाज, चीन के साथ युद्ध में लगाई थी जान की बाजी

वर्ष 1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत का तिरंगा लेकर सरहद पर लड़ाई लड़ने वाला वीर आज शहडोल के जयसिंहनगर में जीवन और मौत की जंग लाचारी के बीच लड़ रहा है. जीवन भर देश की सेवा करने वाले इस वीर सपूत के पास इतनी भी धनराशि नहीं कि वह अपना इलाज करा सके. इस वीर सपूत की दयनीय हालत देख मोहल्ला वासियों को तरस आया और 40 हजार रुपये चंदा इकट्ठा कर उसका इलाज कराने की कोशिश कर रहे हैं.

शहडोल के वीर सपूत सूरज प्रसाद द्विवेदी की वीर गाथा यहीं खत्म नहीं होती वो 1971 के बांग्लादेश में नागालैण्ड की दुर्गम पहाड़ी तथा तवांग की खतरनाक घाटियों में सिर में फौज की टोपी तथा कंधे में तिरंगा और कमर पर 10 किलो गोली की पेटी बांधकर सीमा पर राष्ट्र अखंडता की रक्षा की थी.

सेना से रिटायर होने के बाद वीर सैनिक सूरज प्रसाद द्विवेदी देवरा गांव में निवास करता रहा और आज बीमार हालत में जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहा है. वर्तमान समय में सूरज का इलाज नागपुर में चल रहा है. जिला प्रशासन ने आज तक ऐसे महान सपूत की सुध नहीं ली. बताया तो यह भी जाता है कि चीन के युद्ध में जिन सिपाहियों ने भाग लिया था उनको 10 एकड़ जमीन देने की घोषणा की गई थी.

वीर सैनिक सूरज प्रसाद द्विवेदी ने बताया कि कुछ समय पहले उनके नाम की फाइल भी चली थी, किन्तु प्रशासनिक अफसरों के रुचि नहीं दिखाने की वजह से उन्हें जमीन नहीं मिल पाई. सूरज प्रसाद द्विवेदी ने बताया कि उनके तीन पुत्र हैं तथा सभी अल्प वेतन में गुजर-बसर करते रहे. यही वजह रही कि बच्चों की पढ़ाई भी नहीं हो सकी. बड़ा बेटा बस स्टैण्ड में कुली का कार्य करता है. दो बच्चे घर पर ही पेंशन पर गुजर-बसर करते हैं. उन्होंने बताया कि इन दिनों तीनो बच्चे भी बीमार हैं.

कलेक्टर मुकेश शुक्ल ने माना कि चीन के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले सैनिकों को जमीन देने का प्रावधान है. उन्होंने कहा कि जिले में एक या दो सैनिकों ने पहले कभी जमीन के लिए आवेदन किया था. नए सिरे से पड़ताल कर संभव हुआ तो सैनिकों को जमीन का आवंटन कर दिया जाएगा. यदि उनके यह अधिकार क्षेत्र से बाहर हुआ, तो वह राज्य सरकार को पूरा मामला भेज देंगे.