आज भी कृष्ण के निशान वहां है मौजूद जहां गोपियों की रासलीला से लेकर कालिया नाग का किया था मर्दन

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। कृष्ण को लीलाधर भी कहा जाता है। उन्होंने जन्म से लेकर गोलोकवासी होने तक कई लीलाएं कीं, जिनके निशान आज भी मथुरा में मौजूद हैं। उनकी अपनी पौराणिक महत्ता है। बड़ी संख्या में आस्थावान यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। लेकिन कोरोनावायरस महामारी के चलते इस बार मंदिर सूने पड़े हैं। आइए जानते हैं लीलाधर से जुड़े पौराणिक स्थलों की कहानियां…

वटवृक्ष: जिसके नीचे बैठ बंशी बजाते थे मुरलीधर

वृंदावन में बंशीवट नाम से गोपेश्वर महादेव मंदिर है। यहां धदीलता पेड़ आज भी मौजूद है। पेड़ की पत्तियों से दूध निकलता है। मान्यता है कि इसी पेड़ के नीचे बैठकर भगवान कृष्ण बंशी बजाते थे। जिसकी धुन सुनकर गायें कृष्ण के पास पहुंच जाती हैं। इसी वटवृक्ष के नीचे भगवान ने यमुना किनारे 16108 गोपियों के साथ शरद पूर्णिमा को महारास किया। कहानी ऐसी भी है कि इस महारास में पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंध था। लेकिन इस महारास को देखने के लिए भगवान शिव भी व्याकुल थे। यमुना जी ने उनका स्त्री रूप में श्रृंगार किया। इसके बाद शिव भी महारास में पहुंच गए। लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें पहचान लिया। तभी से उनको गोपेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है।

चीर घाट: गोपियों के चुराए थे वत्र

वृंदावन में यमुना महारानी को श्रीकृष्ण की पटरानी कहा जाता है। उसमें बिना वस्त्र स्नान करना स्त्रियों के लिए भी निषेध होता है। भगवान ने विश्व को यही संदेश देने के लिए यमुना किनारे चीरहरण लीला रची थी। बताया जाता है कि एक बार भगवान वृंदावन में यमुना किनारे अपने साथियों के साथ खेल रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ गोपियां यमुना में बिना वस्त्रों के स्नान कर रही हैं और उन्होंने अपने वस्त्र यमुना किनारे रखे हैं। गोपियों को सबक सिखाने के लिए भगवान ने उनके कपड़े उठा लिए और यमुना किनारे खड़े एक बड़े वृक्ष पर चढ़ गए।

जब गोपियां स्नान के बाद बाहर निकलने को हुईं और उन्हें वस्त्र नहीं मिले तो विचलित हो गयीं। चारों ओर देखा। वस्त्रों को लिए पुकार लगाई। लेकिन उन्हें कहीं कोई दिखाई नहीं दिया। इसी बीच गोपियों की निगाह यमुना किनारे एक पेड़ पर बैठे श्रीकृष्ण और अपने वस्त्रों पर पड़ी। गोपियां भगवान से अपने वस्त्र वापस लौटाने की गुहार लगाने लगीं। लेकिन श्रीकृष्ण ने बिना वस्त्रों के फिर यमुना में स्नान न करने का संकल्प लेकर ही वस्त्र वापस लौटाए। तभी से इस स्थान को पवित्र चीरघाट का नाम दे दिया गया। लोग आज भी इस स्थल की पूजा कर पुण्य कमाने देश-विदेश से आते हैं। आज भी कई श्रद्धालु इस पेड़ पर कपड़ा बांधकर अपनी मनोकामना मांगते हैं।

काली घाट: यहां किया था कलिया नाग का मर्दन

भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का मर्दन कर यमुना नदी को विषैला होने से बचाया था। इसके निशान आज भी वृंदावन स्थित काली घाट पर मौजूद हैं। बताया जाता है कि द्वापर युग में कालिया नाग का यमुना किनारे बड़ा आतंक था। उस आतंक से सभी बृजवासी परेशान थे। भगवान श्री कृष्ण की पटरानी यमुना को कालिया नाग ने दूषित भी कर दिया था, जो भी उसका जल पीता था वहीं बेहोश हो जाता था। जब भगवान श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ यमुना किनारे खेल रहे थे, तभी उनकी गेंद यमुना में चली गई। उसी गेंद को लेकर भगवान श्री कृष्ण यमुना में चले गए और वहां लगभग 3 दिन 3 रात रहे। जैसे ही इसका पता मां यशोदा और नंद बाबा को पता चला तो उनका रो-रो कर बुरा हाल हो गया। वह स्थान अभी भी वृंदावन के काली घाट पर है। केली कदंब के पेड़ पर भगवान के छोटे छोटे पैर और हाथों के निशान अभी भी दिखाई देते हैं।

केशी घाट: यहीं किया था केसी दानव का वध

मथुरा के राजा कंस के मित्र कहे जाने वाले केसी दानव का वध भगवान कृष्ण के द्वारा यमुना के घाट पर किया गया था। केसी दानव राक्षस को जब कंस ने अपने काल के रूप में श्री कृष्ण के बारे में जानकारी दी तो वह बृजवासियों को आहत पहुंचाने के लिए वहां पहुंच गया। केसी दानव द्वारा घोड़े के रूप में वृंदावन पहुचा ओर बृजवासियों के साथ जीव जंतुओं को हानि पहुंचाने लगा। जिसके बाद श्री कृष्ण ने यमुना के घाट पर केसी दानव का के केश पकड़ कर वध किया। तभी से इस घाट को केशी घाट के नाम से जाना जाता है। आज भी है स्थान यमुना किनारे वृंदावन में मौजूद है।