पैतृक संपत्ति में बेटी के लिए क्या है अधिकार ?
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संविधान अधिनियम, 1978 में संशोधन के द्वारा, संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार नहीं रह गया है, लेकिन कल्याणकारी राज्य संपत्ति स्वामित्व अधिकार में यह अभी भी एक मानव अधिकार है और कोई भी एक मजबूत आधार के बिना दूसरे से इसे छीन नहीं सकता है। अब बेटियों का पैतृक संपत्ति पर अधिकार होगा, भले ही हिंदू उत्तराधिकार (अमेंडमेंट) अधिनियम, 2005 के लागू होने से पहले ही कोपर्शनर की मृत्यु हो गई हो। हिंदू महिलाओं को अपने पिता की प्रॉपर्टी में भाई के बराबर हिस्सा मिलेगा. दरअसल साल 2005 में ये कानून बना था कि बेटा और बेटी दोनों को अपने पिता के संपत्ति में समान अधिकार होगा।

पिता की प्रॉपर्टी पर बेटियों का कितना हैं अधिकार…

आपको बता दें कि 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में संशोधन किया गया था. इसके तहत पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हिस्सा देने की बात कही गई है. क्लास 1 कानूनी वारिस (Legal heir) होने के नाते संपत्ति पर बेटी का बेटे जितना हक है. शादी से इसका कोई लेना-देना नहीं है. अपने हिस्से की प्रॉपर्टी पर दावा किया जा सकता है.

हिंदू कानून के तहत प्रॉपर्टी दो तरह की हो सकती है. एक पिता के द्वारा खरीदी हुई. दूसरी पैतृक संपत्ति होती है. जो पिछली चार पीढ़ियों से पुरुषों को मिलती आई है. कानून के मुताबिक, बेटी हो या बेटा ऐसी प्रॉपर्टी पर दोनों का जन्म से बराबर का अधिकार होता है.

कानून कहता है कि पिता इस तरह की प्रॉपर्टी को अपने मन से किसी को नहीं दे सकता है. यानी इस मामले में वह किसी एक के नाम वसीयत नहीं कर सकता है. इसका मतलब यह है क‍ि वह बेटी को उसका हिस्सा देने से वंचित नहीं कर सकता है. जन्म से बेटी का पैतृक संपत्ति पर अधिकार होता है.

पिता की खरीदी गईं प्रॉपर्टी पर क्या है कानून: अगर पिता ने खुद प्रॉपर्टी खरीदी है यानी पिता ने प्लॉट या घर अपने पैसे से खरीदा है तो बेटी का पक्ष कमजोर होता है. इस मामले में पिता के पास प्रॉपर्टी को अपनी इच्छा से किसी को गिफ्ट करने का अधिकार होता है. बेटी इसमें आपत्ति नहीं कर सकती है.

पिता की मृत्यू होने पर क्या होगा: अगर पिता की मौत बिना वसीयत छोड़े हो गई तो सभी उत्तराधिकारियों का प्रॉपर्टी पर बराबर अधिकार होगा. अगर आसान शब्दों में कहें तो हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों को चार वर्गों में बांटा गया है.

इसमें सबसे पहले प्रॉपर्टी क्लास-एक के उत्तराधिकारियों के पास जाती है. इनमें विधवा, बेटी और बेटे या अन्य शामिल हैं. प्रत्येक उत्तराधिकारी प्रॉपर्टी का एक हिस्सा लेने का हकदार है. इसका मतलब यह है कि पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का बराबर हिस्सा है.

बेटी का जन्म 9 सितंबर 2005 के बाद हुआ या उसके पहले. पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का बेटे जितना अधिकार होगा. फिर चाहे पैतृक संपत्ति हो या सेल्फ ऑक्यूपाइड. अगर पिता की मौत 2005 से पहले हुई है तो बेटी का पैतृक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा. सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी को पिता की वसीयत के अनुसार बांटा जाएगा.

महिला के तौर पर परिवारिवारिक संपत्ति में हिस्सेदारी के अधिकार के लिए ये जानना जरूरी है।
संपत्ति की विरासत के कानून हमेशा महिलाओं के पक्ष में नहीं रहे हैं। हालांकि इसमें नवंबर 2005 में बदलाव आया। 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधिन करते हुए ये अधिकार दिया कि महिलाएं जन्म के साथ ही संपत्ति की उत्तराधिकारी मानी जाएं। इसका मतलब ये हुआ कि आप पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांग सकती हैं, शादी के पहले भी और शादी के बाद भी बशर्ते आप वयस्क हों।

क्या शादीशुदा बेटी का पिता की संपत्ति में हक है?

2005 में हुए हिंदू उत्तराधिकार कानून संशोधन के बाद विवाहित या अविवाहित बेटी को पिता के हिंदू अविभाजित परिवार का हिस्सा माना जाता है, इस आधार पर पिता की संपत्ति में हक का कानूनी अधिकार मिल जाता है।

  • हालांकि इस अधिकार का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब:
  • जब आपके पिता की मृत्यु 9 सितंबर 2005 के बाद हुई हो।

विवाहित महिला के तौर पर पैतृक संपत्ति में आपके क्या हैं अधिकार?

कोई भी संपत्ति जो बीते चार पीढ़ियों तक पुरुषों के बीच अविभाजित चली आ रही हो उसे पैतृक संपत्ति माना जाता है। कोई संपत्ति उस स्थिति में भी पैतृक संपत्ति बन जाती है अगर किसी पिता की मौत अपनी संपत्ति की वसीयत के बिना ही हो जाती है। हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के तहत आप जन्म के साथ ही अपने भाइयों बहनों के साथ संपत्ति के आधिकार के हकदार हो जाते हैं, आप संपत्ति में हिस्सा मांग सकते हैं।

  • ये 9 सितंबर 2005 से सभी जीवित उत्तराधिकारियों पर लागू होता है, भले ही वे कब पैदा हुए हों।
  • हालांकि आप इन स्थितियों में पिता की संपत्ति में कोई कानूनी हक नहीं मांग सकते यदि:
  • यदि पिता ने संपत्ति अपने दम पर हासिल की है न कि इसे विरासत में पाया है
  • पिता ने संपत्ति अपने साधने से जुटाई है और आपको वसीयत से बाहर रखा है
  • लेकिन पिता ने अपने दम पर संपत्ति हासिल की है और बिना वसीयत बनाए ही उनकी मौत हो जाती है तो ये पैतृक संपत्ति मानी जाएगी। इस स्थिति में मां और भाइयों के साथ आपके पास भी संपत्ति में बराबर का कानून हक है।

क्या दादाजी की संपत्ति में शादीशुदा औरत के तौर पर आपका कानूनी हक है?

हर किसी की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी और अधिकार है, बशर्ते कि वो पुरुषों की चार पीढ़ियों के बीच अविभाजित रही है या फिर बिना वसीयत बनाए ही पिता की मौत हो गई हो। हालांकि यदि आपके दादाजी ने अपने दम पर ही संपत्ति जुटाई है न कि विरासत में मिली है और बिना वसीयत बनाए ही उनकी मौत हो जाती है तो आपके पिता या माता संपत्ति के अधिकारी होंगे न कि आप। आपका और आपके भाइयों-बहनों का केवल उस स्थिति में ही दादा की संपत्ति में अधिकार होगा जब आपके पिता की मौत दादाजी से पहले ही हो जाए।

क्या एक शादीशुदा महिला के पास अपनी मां की मौत के बाद अपने नाना की संपत्ति में अधिकार है?
आपके नाना ने संपत्ति चाहे खुद के दम पर जुटाई हो या फिर विरासत में मिली हो आपकी मां और उनके भाई बहनों ही कानूनी उत्तराधिकारी होंगे और उनका ही उस संपत्ति पर अधिकार होगा।

महिलाओं की हालत में बदलाव
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता. हमारे समाज में यह कहावत सदियों से चल रही है. बावजूद इसके घर-परिवार, समाज की बंदिशों से लेकर कामकाज की जगह पर लैंगिक भेदभाव सहित महिलाएं लंबे समय से उपेक्षा की शिकार रही हैं. महिलाओं की हालत में कोई क्रांतिकारी बदलाव तो नहीं आया है, लेकिन पहले के मुकाबले आज स्थिति कुछ सुधरी है. जागरूकता बढ़ने, वैश्विक मंचों की सक्रियता और सोशल मीडिया के जरिए उठाई जा रही आवाजों, कानून में सकारात्मक बदलावों और महिला-पुरुष में फर्क न करने वाले कानूनों को लागू किए जाने से स्थिति सुधरी है.

महिला सशक्तिकरण की जरूरत
कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कदम उठाए जाने की जरूरत है. भारत में विभिन्न कारणों से लंबे समय से महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर अधिकार से वंचित रखा गया है. इसका एक कारण तो यह है कि उत्तराधिकार कानून में एकरूपता नहीं है. कई धार्मिक समुदायों पर उनके अलग कानून लागू होते हैं और कई आदिवासी समुदाय अपने परंपरागत नियमों के हिसाब से चल रहे हैं.

परिवार का हक खोने का डर
इनमें से अधिकतर कानूनों में प्रॉपर्टी, खेती-बाड़ी की जमीन या दूसरी अचल संपत्ति महिलाओं को देने के प्रति हिचक दिखती है. ऐसा जमीन का बंटवारा होने या लड़की की शादी होने पर जमीन पर परिवार का हक खत्म हो जाने के डर के कारण है. भारत में उत्तराधिकार का बुनियादी ढांचा धर्म के आधार पर अलग-अलग दिखता है, न कि संपत्ति के आधार पर. हिंदू परिवार और दूसरे धर्म के लोगों के अपने उत्तराधिकार कानून हैं, वहीं बाकी समूहों में उत्तराधिकार के अधिकार इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 से तय होते हैं.

साक्षरता की कमी
महिलाओं में जागरूकता और साक्षरता की कमी है. उन्हें अपने अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं है और वे अदालतों में जाने से भी हिचकती हैं. तीसरा कारण यह है कि पितृ सत्तात्मक परंपराओं के कारण महिलाओं में भय का माहौल बनाया हुआ है. इसके कारण वे अपने उत्तराधिकार के अधिकारों के लिए लड़ना नहीं चाहती.

महिलाएं छोड़ देती हैं दावा
देश के कई उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में अधिकारों को स्वेच्छा से छोड़ने के रिवाज के कारण महिलाएं पैतृक संपत्ति पर अपना दावा छोड़ देती हैं. इसे इस आधार पर उचित ठहराया जाता है कि उनके पिता विवाह में दहेज देते हैं, लिहाजा बेटों को संपत्ति मिलनी चाहिए. हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956 बनने तक कानून साफ तौर पर महिलाओं को उनका हक़ देने के खिलाफ था.

साल 2005 से आया है बदलाव
ऑनलाइन वसीयत बनाने वाली दिल से विल. कॉम के संस्थापक राज लखोटिया ने कहा, “साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में बदलाव होने के बाद मामला संतुलित हुआ. इस बदलाव से पिता की पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का अधिकार सुनिश्चित किया गया.”

संपत्ति के भाव भी एक वजह
महिलाएं उत्तराधिकार से जुड़े अपने अधिकारों पर हमेशा कानूनी पहल के कारण ही बल नहीं देती हैं. थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन ने इस साल मार्च में एक रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक हरियाणा में जमीन के भाव उछलने के कारण उत्तराधिकार से जुड़े अपने अधिकार का दावा करने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है. महिलाओं को सशक्त बनाने के मकसद वाले उत्तराधिकार कानूनों का एक विपरीत असर भी पड़ा है.

बुढ़ापे का सहारा
साल 1970-1990 के बीच महिलाओं को उत्तराधिकार से जुड़े अधिकार दिए जाने से बच्चियों की भ्रूण हत्या बढ़ी और बच्चियों की मृत्यु दर में बढ़ोतरी हुई. इकनॉमिक सर्वे 2017-18 में भी यह बात कही गई. कुछ लोग इसे इस तरह देखते हैं कि लड़कियों को मिलने वाली पैतृक संपत्ति उनकी ससुराल के लोगों के हाथ में चली जाएगी. बेटों को पैतृक संपत्ति देने में यह सोच भी काम करती है कि वे उस जमीन के जरिए संपत्ति बढ़ाएंगे और वृद्धावस्था में माता-पिता की देखभाल करेंगे.

वसीयत या विरासत
सेल्फ एक्वायर्ड प्रॉपर्टी के मामले में हिंदू पिता के पास यह अधिकार होता है कि वह अपनी मर्जी से इसे किसी को भी देने की वसीयत कर सकता है. इसमें वह महिला से भेदभाव कर सकता है और इसके लिए कोई दंड नहीं दिया जा सकता है. अगर किसी पुरुष ने वसीयत न बनाई हो और उसका निधन हो जाए तो उसकी प्रॉपर्टी उसके वारिसों में चार श्रेणियों के हिसाब से बांटी जाती है.

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ें :-

एडवर्स पजेशन: (Adverse Possession)

  • यह एक विधिक शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘प्रतिकूल कब्ज़ा’ है।
  • अगर किसी ज़मीन या मकान पर उसके वैध या वास्तविक मालिक के बजाय किसी अन्य व्यक्ति का 12 वर्ष तक अधिकार रहा है और अगर वास्तविक या वैध मालिक ने अपनी अचल संपत्ति को दूसरे के कब्जे से वापस लेने के लिये 12 वर्ष के भीतर कोई कदम नहीं उठाया है तो उसका मालिकाना हक समाप्त हो जाएगा और उस अचल संपत्ति पर जिसने 12 वर्ष तक कब्ज़ा कर रखा है, उस व्यक्ति को कानूनी तौर पर मालिकाना हक दिया जा सकता है।

संपत्ति का अधिकार: (Right to Property):

  • संपत्ति के अधिकार को वर्ष 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकार से विधिक अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया था।
  • 44वें संविधान संशोधन से पहले यह अनुच्छेद-31 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार था, परंतु इस संशोधन के बाद इस अधिकार को अनुच्छेद- 300(A) के अंतर्गत एक विधिक अधिकार के रूप में स्थापित किया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार भले ही संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं रहा इसके बावजूद भी राज्य किसी व्यक्ति को उसकी निजी संपत्ति से उचित प्रक्रिया और विधि के अधिकार का पालन करके ही वंचित कर सकता है।