ब्राम्हणों में नित्य क्रिया के समय कान पर जनेऊ बांधने का क्या है वैज्ञानिक तर्क ?

नेऊ बहुत पवित्र होता है और इसकी पवित्रता को बचाने के लिए उसे उठा कर कान पर लपेट लिया जाता है। लोग बहुत तरह के फायदे गिनाते हैं जैसे कि रोगों से बचाव इत्यादि, परंतु वैज्ञानिक कारण है जब हम शौच जाते समय जनेऊ को कान में डालते हैं तो हमारे कान की जड़ की नस दबती है जिससे शौच खुल कर आता है साथ ही मलमूत्र संबंधी समस्याएं नही आती है।जनेऊ की पवित्रता को बचाए रखने के लिए जनेऊ जब अपवित्र हो जाता है तो उसको बदलना पड़ता है, इसीलिए शौचक्रिया आदि के दौरान उसको कान पर लपेट लिया जाता है।

जनेऊ या यज्ञोपवीत संस्कार सनातन धर्म के सोलह संस्कारों के क्रम का दसवां संस्कार है जिसके बाद संस्कारित बालक को द्विज कहा जाता है। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म जो यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात् ही घटित होता है। यह संस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व को परिमार्जित, परिशोधित और परिवर्धित करता है। यही वह संस्कार है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखार कर उसमें देवताओं जैसी आभा, गुण, मेधा, साहस, धैर्य, वीरता, निर्भीकता,पराक्रम और त्याग जैसी विषेशता का रोपण करता है। गर्भाधान संस्कार से प्ररम्भ हुए संस्कारों की श्रृंखला का समापन दाह संस्कार पर होता है। संक्षेप में यही मनुष्य का जीवन चक्र है।

यह हमारे ऋषियों, मनीषियों की तपस्या, साधना और वैज्ञानिक खोजों का ही परिणाम है जिससे सम्पूर्ण मानव जाति का सदैव ही कल्याण हुआ है। कालान्तर में यवनों और अंग्रेजों के बीभत्स अत्याचारों से त्रस्त भारतीय संस्कारों का पतन ही होगया। आज स्थिति यह है कि हम अपनी ही परम्पराओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों का मजाक उड़ाते हुए अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

यज्ञोपवीत संस्कार हो या हमारा कोई भी धार्मिक कार्यक्रम,‌सभी में प्रकृति के ऐसे गूढ़ तत्वों का समावेश होता है जिससे जाने अनजाने अनेक तरह के लाभ हमें अनायास ही मिलते जाते हैं। यज्ञोपवीत संस्कार से हम प्रकृति की उस ऊर्जा से सम्बद्ध हो जाते हैं जिस ऊर्जा से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन होता है। यह विद्या आधुनिक विज्ञान के पास उपलब्ध नहीं है।

‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ सूत्र के अनुसार ब्रह्माण्ड में जो भी है वही इस पिण्ड या शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड में स्थित विद्युतधारा इस शरीर में भी उसी प्रकार प्रवाहित होती रहती है जैसे कि ब्रह्माण्ड में।

जनेऊ या उपवीत व्यक्ति के बाएं कंधे से लेकर दाहिने हाथ के नीचे कटि प्रदेश तक धारण किया जाता है। रीढ़ के दाहिने और रीढ़ के बाएं, दो प्रकार की विद्युत प्रवाहित होती है। यज्ञोपवीत इन दोनों धाराओं के बीच का न्यूट्रल प्रवाह है। इसके कारण विद्युतधारा का चक्र या सर्किट पूरा हो जाता है। ओवर फ्लो आफ इलैक्ट्रीसिटी की सम्भावना शून्य हो जाती है।

दाहिने कान पर शौच के समय जनेऊ को कम से कम तीन बार अच्छे से लपेटने का प्रावधान है। इससेे शौच के समय होनेवाली ऊर्जा के प्रवाह का सन्तुलन बना रहता है और व्यक्ति के दाहिने कान से सम्बद्ध नसों के कसे रहने से मिर्गी, मूर्छा, लकवा, सफेद धातु का स्राव, नपुन्सकता, जननेन्द्रिय रोग आदि से बचाव होता रहता है। इसके अतिरिक्त शौच के समय रक्त संचार भी सुचारु और सामान्य बना रहता है।

यज्ञोपवीत मन पर नियंत्रण भी करता है और बुद्धि का विकार भी दूर कर देता है। व्यक्ति को भूत-प्रेत आदि बाधाएं भी नहीं रहतीं। यज्ञोपवीत के लाभ अनगिनत हैं। इन लाभों का पूर्ण उपयोग करने के लिए आपको इसे विधि पूर्वक धारण करना होगा और इससे सम्बन्धित सभी नियमों का पालन भी करना होगा।