आर्यभट्ट के शून्य की खोज से पहले कैसे पता लगा कि रावण के दस सिर थे?

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रामायण के काल के दौरान भारत में तब रोमन नुमेरल नहीं थे तब ‘ब्राह्मी स्क्रिप्ट का प्रयोग किया जाता था। रामायण के काल में इसकी मूल लिपि का प्रयोग होता होगा। मेरा कहने का अर्थ केवल यह था के शून्य की खोज से पहले भी लोग गिनती किया करते थे। अलग जगहों पर वे अलग चिह्न इस्तेमाल करते थे पर उसका भाव एक ही है।

शून्य की खोज से पहले और बाद में सबसे बड़ा अंतर यह था की पहले काफी ज़्यादा चिह्न याद करने पड़ते थे गिनती के लिए जिस वजह से गिनती की हमेशा एक लिमिट हो जाती थी। शून्य की खोज के बाद केवल दस चिह्न के प्रयोग से अनन्तता तक गिन सकते हैं जिस्का बहुत गंभीर प्रभाव पड़ा था।

रामायण के काल में लिखित परंपरा नहीं थी मौखिक थी। यह जो गिनती है वो 1 से शुरू ही कर 9 पे ख़त्म नहीं होती है। इसे यूं समझिए की कुल 11 पेड़ है और सब में अलग अलग चिन्ह है। पहला चिन्ह 1 को बताता है दूसरा चिन्ह 2 को और 11 चिन्ह 11 को। 1 से 9 तक और एक 0 मिलाकर कुल 10 संख्या है सबका अलग अलग गुण है वैसे ही पेड़ वाले उदहारण में कुल 11 संख्या है और इसमें कुल 11 गुण है।

आज के समय के हिसाब से यदि किसी को 12 गुण चाहिए होगा तो वो 1 गुण और 2 गुण के मिश्रण से बनेगा और यदि 9 गन चाहिए होगा तो सिर्फ 9 की ही जरूरत है। यदि कुल 11 तरह के गुण हो तो 11 गुण सिर्फ 11 गुण से ही बनेगा। 11 गन वाले संख्या व्यवस्था में यदि को 112 गन चाहिए तो वी 11 गन और 2 गन के मिश्रण से बनेगा।

यह है ब्रह्मी नुमेरल्स :

सनातन धर्म संख्या में अनेको गुण है जिस प्रकार आज के संख्या में 10 अलग अलग गुण है वैसे ही सनातन धर्म के संख्या में सारा गुण अपने आप में भिन्न है और इसे एक, दो, दस, इस प्रकार से गिनती होती है। यहाँ संख्या वर्ण से बनी हुए शब्द से बनता है जिसे दस को 10 नहीं लिखा जाता है बल्कि उसे दस बोला जाता है। यह वैसा ही है जैसे अंग्रेजी में दस को 10 लिखा जाता है, शब्दो में इसे ten लिखा जाता है और रोमन में इसे X लिखा जाता है।