मनोरंजन के नाम पर ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ कहाँ तक उचित है…?

1954 में एक फिल्म आई थी “जागृति”, इस फिल्म में मनोरंजन घोष और पंडित उर्मिल द्वारा लिखी कहानी को निर्माता सशाधर मुखर्जी और निर्देशक सत्येन बोस ने इसे परदे पर उतारा था | वैसे तो इस फिल्म में कई देशभक्ति गीत थे | लेकिन कवि प्रदीप जी का एक गीत जो आज भी सबकी मुख पर है, बहुत प्रसिद्ध हुआ था | उस गीत के बोल थे “आओ बच्चों तूम्हें दिखायें झांकी हिन्हूस्तान की” |

इस गीत के माध्यम से कवि प्रदीप जी ने पूरे भारत की सांस्कृतिक धरोहरों और इतिहास को शब्दों में पिरोकर बखुबी प्रस्तुत किया था | उसी गीत में आगे कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं . . .

ये हैं अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला हैं आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अंगारों पे
बोल रही है कण कण से कुरबानी राजस्थान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम, वंदे मातरम, वंदे मातरम

आज के बौद्धिक फिल्मकार इन गीतों को भी झुठलाते हुए नए प्रकार की झांकी हिन्दुस्तान के सामने प्रस्तुत करने पर आमादा हैं | एक बात और है यदि नही झुठलाएंगे तो कैसे भारत तोड़ेंगे ? बहराल अभी इतिहास में सबसे गर्म झन्नाटेदार थप्पड़ Sanjay Leela Bhansali कमाया है | संभव है इस थप्पड़ की गूंज उनके कानों में हिन्दुस्तान की झांकी को उसके सही स्वरूप में प्रस्तुत करने को प्रेरित करेगी |

संजय लीला भंसाली जी अगर आपको प्रेम कहानी ही बनानी है तो अल्लाउदीन खिल्जी की बेटी “फिरोजा” जो राजकुमार विरमदेव से प्रेम करती थी और औरंगजेब की एक बेटी “जैबुन्निसा बेगम” कुँवर छत्रसाल के पीछे दीवानी थी | उनके ऊपर बनाओ फिर देखो आतंकवाद क्या होता है ? वैसे मैं गुंडागर्दी उचित नहीं मानता लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अपनी ‘बौद्धिक गुंडागर्दी’ भी तो बंद कीजिए | भंसाली जी जो आपके साथ हुआ उसकी मैं गहरी निन्दा करता हूँ और निन्दा करने का एक मौका और चाहता हूँ |